आधा परिवर्तन आधा विकास
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मंत्री से लेकर संतरी तक, घर से लेकर बाहर तक , गरीब से लेकर अमीर तक सभी एक सुर में "बेटी बचाओ बेटी पढाओ" का गाना गा रहे हैं, ये तो बहुत अच्छी बात है कि सारा देश मिलकर एक साथ उस बेटी के बारे में सोच रहा है जिसे कभी गर्भ में, कभी जन्म के बाद और कभी शादी के बाद मार दिया जाता था| इस मुहीम का असर भी हमें देखने को मिला है अब बेटियों की वो हालत नहीं जो आज से कुछ सालों पहले तक हुआ करती थी| क्योंकि उनकी स्थिति में सुधार लाने के लिए सरकार ने भी युद्ध स्तर पर अपने प्रयास किये हैं| लेकिन समस्या आज भी विकराल है
आज की बेटी को दोहरा कार्यभार संभालना पड़ रहा है वो जी जान लगाकर पढ़ती है और एक अच्छे मुकाम पर भी पहुँचती है फिर जरूरत पड़ती है विवाह की | विवाह हमारे जीवन का अभिन्न अंग है जिससे सृष्टि को गति प्राप्त होती है, हर माँ बाप चाहते हैं कि उनकी बेटी का विवाह हो उसका घर बसे| फिर शुरू होता है वही सब जो कभी नहीं बदला| देखना दिखाना, अपनी योग्यताएं गिनवाना ओर सबसे बड़ी बात, खाना पकाना जानती हो ? बेटी को तो फुर्सत ही नहीं मिली थी ये सब सोचने की, उसने तो सिर्फ अपने करियर पर ध्यान दिया था अब तक | उधर एक लड़का मुंह बाए खड़ा है कि उसकी जिन्दगी में शादी के बाद एक लड़की आएगी जो उसे सुबह बड़े प्यार से बेड टी देगी, उसका तौलिया बाथरूम में टंगाएगी, उसके मौजे निकाल कर देगी, उसे अच्छा अच्छा पका कर खिलाएगी| पुरानी कहावत है पति को खुश करने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है| लड़की कि तो जिन्दगी बदल दी "बेटी बचाओ बेटी पढाओ" के नारे ने, लेकिन लड़के का क्या ? वो तो वही अपने पापा के पदचिन्हों पर खड़ा है उम्मीदों का टोकरा लेकर|
क्योंकि माँ ने जब बेटी के लिए इतना किया तो उसने पलभर के लिए भी ये नहीं सोचा कि बेटों को भी बदलने कि जरूरत है उनकी सोच, उनकी आशाएं, उनके काम | न अब माँ के जैसी बीवी मिलेगी और न अब पापा के जैसे ऐशो आराम | माँ ये कभी नहीं देख सकती कि उसका बेटा जूठे बर्तन साफ़ करे, रसोई में कलछी घुमाये| करियर और गृहस्थी के बीच बेटियां और पिसने लगती हैं जिससे आपसी रिश्तों में मनमुटाव पैदा होने लगता है और सम्बन्ध विच्छेद के कगार तक पहुँच जाते हैं इसलिए बेटों कि मानसिकता में परिवर्तन किये बगैर सिर्फ बेटियों को पढ़ा लेना ही काफी नहीं है| दोनों अगर समान रूप से बाहर काम करने जाते हैं तो घर में भी दोनों को अपनी अपनी जिम्मेदारियां समझनी ही होंगी| घर किसी एक का नहीं होता और न ही किसी एक के समर्पण से चलता है|
सुखी जीवन का मूलमंत्र यही है कि दोनों एक दुसरे कि भावनाओं का और कार्यों का सम्मान करें| तभी देश का विकास और सकारात्मक परिवर्तन का मन्त्र सफल हो सकेगा|
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मंत्री से लेकर संतरी तक, घर से लेकर बाहर तक , गरीब से लेकर अमीर तक सभी एक सुर में "बेटी बचाओ बेटी पढाओ" का गाना गा रहे हैं, ये तो बहुत अच्छी बात है कि सारा देश मिलकर एक साथ उस बेटी के बारे में सोच रहा है जिसे कभी गर्भ में, कभी जन्म के बाद और कभी शादी के बाद मार दिया जाता था| इस मुहीम का असर भी हमें देखने को मिला है अब बेटियों की वो हालत नहीं जो आज से कुछ सालों पहले तक हुआ करती थी| क्योंकि उनकी स्थिति में सुधार लाने के लिए सरकार ने भी युद्ध स्तर पर अपने प्रयास किये हैं| लेकिन समस्या आज भी विकराल है
आज की बेटी को दोहरा कार्यभार संभालना पड़ रहा है वो जी जान लगाकर पढ़ती है और एक अच्छे मुकाम पर भी पहुँचती है फिर जरूरत पड़ती है विवाह की | विवाह हमारे जीवन का अभिन्न अंग है जिससे सृष्टि को गति प्राप्त होती है, हर माँ बाप चाहते हैं कि उनकी बेटी का विवाह हो उसका घर बसे| फिर शुरू होता है वही सब जो कभी नहीं बदला| देखना दिखाना, अपनी योग्यताएं गिनवाना ओर सबसे बड़ी बात, खाना पकाना जानती हो ? बेटी को तो फुर्सत ही नहीं मिली थी ये सब सोचने की, उसने तो सिर्फ अपने करियर पर ध्यान दिया था अब तक | उधर एक लड़का मुंह बाए खड़ा है कि उसकी जिन्दगी में शादी के बाद एक लड़की आएगी जो उसे सुबह बड़े प्यार से बेड टी देगी, उसका तौलिया बाथरूम में टंगाएगी, उसके मौजे निकाल कर देगी, उसे अच्छा अच्छा पका कर खिलाएगी| पुरानी कहावत है पति को खुश करने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है| लड़की कि तो जिन्दगी बदल दी "बेटी बचाओ बेटी पढाओ" के नारे ने, लेकिन लड़के का क्या ? वो तो वही अपने पापा के पदचिन्हों पर खड़ा है उम्मीदों का टोकरा लेकर|
क्योंकि माँ ने जब बेटी के लिए इतना किया तो उसने पलभर के लिए भी ये नहीं सोचा कि बेटों को भी बदलने कि जरूरत है उनकी सोच, उनकी आशाएं, उनके काम | न अब माँ के जैसी बीवी मिलेगी और न अब पापा के जैसे ऐशो आराम | माँ ये कभी नहीं देख सकती कि उसका बेटा जूठे बर्तन साफ़ करे, रसोई में कलछी घुमाये| करियर और गृहस्थी के बीच बेटियां और पिसने लगती हैं जिससे आपसी रिश्तों में मनमुटाव पैदा होने लगता है और सम्बन्ध विच्छेद के कगार तक पहुँच जाते हैं इसलिए बेटों कि मानसिकता में परिवर्तन किये बगैर सिर्फ बेटियों को पढ़ा लेना ही काफी नहीं है| दोनों अगर समान रूप से बाहर काम करने जाते हैं तो घर में भी दोनों को अपनी अपनी जिम्मेदारियां समझनी ही होंगी| घर किसी एक का नहीं होता और न ही किसी एक के समर्पण से चलता है|
सुखी जीवन का मूलमंत्र यही है कि दोनों एक दुसरे कि भावनाओं का और कार्यों का सम्मान करें| तभी देश का विकास और सकारात्मक परिवर्तन का मन्त्र सफल हो सकेगा|
सरिता पन्थी


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