शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

खुद ही रूठे और खुद ही मना लेते है


 खुद ही रूठे और खुद ही मना लेते है


खुद ही रूठे और खुद ही मना लेते है
दिल जब रोता है तो खुद ही हंसा लेते है

सुनी हो जाती है जब कभी आँखें
आंसुओं से सजा लेते है

भर जाता है जब दिल दर्द से
मुस्कराहट होठों पे सजा लेते है

अपने गम का हम खुद ही
जी भरके मज़ा लेते है

नवरात्र पूजन


नवरात्र पूजन

आओ पूजा करें देवी की रोज नये रूप में

सराबोर कर दें देवी को चन्दन और धुप में|| 



खुश होकर दिया वरदान तो होगा हर एक सपना पूरा

सच जीवन हो जाएगा कुछ ना रहेगा फिर अधुरा ||



बेटी मरने के लिए और बहु है जलने के लिए

फिर भी चाहिए कन्या नवरात्र पूजन के लिए||



जग को तो बहुत लिया ठग

आओ थोडा भगवन को भी ठगे||



रोज सुबह पूजा करें और दिन भर करे क्लेश

भूखे पेट रहे दिनभर तो धैर्य बचा ना शेष||



नही मांगती देवी हमसे श्रध्दा के भी भाव

बिन बोले ही दिख जाते है उसको दिल के घाव||



मन में लगी है कालिख ऐसी छूटती नही छुटाए

यही दे देती पाप का फल तो करते हाय हाय||



बसती है देवी श्रष्टि की, घर की हर एक नारी में

नारी का सम्मान जो हो तो, खुशियाँ घर की फुलवारी में ||

गणेश जी की व्यथा


गणेश जी की व्यथा


गणेश जी ने व्यथा सुनाई

माँ पार्वती के आगे

इतनी सर्दी पड़ रही माँ

कैसे कोई  नींद से जागे



भक्तजन जगा देते है

घंटी बजा बजा कर

लड्डुओं का लोभ दिखलाते

थाल सजा सजा कर



ठन्डे ठन्डे पानी से

रोज पुजारी नहलाता

कितनी भी सर्दी लग जाए

छींक कभी ना मैं पाता



कपडे तुमने कम पहनाये

कुछ तो ब्रांडेड दिलवा दो

बुना ना जाता स्वेटर तुमसे

उनी कुछ भी सिलवा दो



बात मेरी बहुत है ख़ास

मुझ पर तुम कर लो विश्वास

बिगड़ रही है सेहत मेरी

हफ्ते में दे दो एक अवकाश

फेसबुक की महिमा


 फेसबुक की महिमा


सुन्दर सुन्दर नार
करके साज श्रृंगार
फेसबुक पे छा जाते
नित चित्रों के हार
नित चित्रों के हार देख
दमकते सबके मुहार
इसकी भूल भुलैया में
छूटा घर संसार
छुटा घर संसार
लुट गया कारोबार
फेसबुक के क़दमों में
डाल दिए हथियार
लत, कुलत, महालत
सबको दे लतियाए
इसकी लत ऐसे लगे
पानी ना मांगन पाए
एक ज्ञानी एक अज्ञानी
अथाह उर आनंद समाता
दोनों ज्ञानी हो जाते तो
घरद्वार छींके टंग जाता
कब तक यूँ ही दौड़ेंगे
सपनो के रथ पे सवार
हकीकत की एक चोट

देगी सब भूत उतार 

नही मरता प्रेम मेनोपॉज से


नही मरता प्रेम मेनोपॉज से


दिल धडकता है सांसे सुलगती हैं



चेहरे पर अनगिनत रंग..



अब भी बिखर जाते हैं



आईना देखकर मुस्कुराना अच्छा लगता है



फूल, खुशबु, भौरे, पतंगे,



सब कुछ ही तो अच्छे लगते हैं..



बारिश की बूंदें तन को अब भी तरंगित करती हैं 



हवाएं मन को गुदगुदा जाती हैं



 



मेनोपॉज के इतने सालों बाद भी,



तो कुछ भी तो नहीं बदला .



अगर कुछ बदला है तो वो है,



सोचने का नजरिया...



खुद को और ज्यादा खुबसूरत



महसूस करती हूँ इन दिनों ..



आत्मविश्वास पहले से ज्यादा बढ़ गया है



धैर्य,धीरज और स्थिरता जैसे गहने



चार चाँद लगा रहे हैं मेरे व्यक्तित्व में ..



 



कौन कहता है मेनोपॉज वृद्धावस्था की देहरी है ?



मैं तैयार हूँ जिंदगी की दूसरी पारी के लिए



ये अहसास हैं मेरे जिंदा होने के



 



ये किसी मेनोपॉज नाम के कीटाणु से मर नही सकते ...

चाहत के दीप


चाहत के दीप


जब भी तुमको पास में अपने पाते हैं

चाहत कर हम सौ सौ दिये जलाते हैं



कौन डगर है जिस पर हमको चलना है

कौन से रस्ते तुम तक लेकर जाते हैं



आग लगाते हैं वो खुद आगे बढ़कर

दामन अपना क्यों फिर वही बचाते हैं



याद हमें करते हैं वो भी छुप छुपकर

हम पूछें तो कहने से शर्माते हैं



करते हैं वो बात बहाने से जब भी

सच्चे झूठे किस्से कई सुनाते हैं



आते हैं वो याद हमें जब रह रहकर

दिल से अपने कैसे हमें भुलाते हैं





जब भी तुमको पास में अपने पाते हैं

चाहत कर हम सौ सौ दिये जलाते हैं



कौन डगर है जिस पर हमको चलना है

कौन से रस्ते तुम तक लेकर जाते हैं



आग लगाते हैं वो खुद आगे बढ़कर

दामन अपना क्यों फिर वही बचाते हैं



याद हमें करते हैं वो भी छुप छुपकर

हम पूछें तो कहने से शर्माते हैं



करते हैं वो बात बहाने से जब भी

सच्चे झूठे किस्से कई सुनाते हैं



आते हैं वो याद हमें जब रह रहकर

दिल से अपने कैसे हमें भुलाते हैं

अंजाम को सौ सौ बार गया वो इश्क हमारा हार गया



अंजाम को सौ सौ बार गया
वो इश्क हमारा हार गया।।



अंजाम को सौ सौ बार गयावो इश्क हमारा हार गया।।

इस पार बसा था अपना जहांतू छोड़के क्यों उसपार गया।।

अक्स तेरा था मेरे आईने मेंधुंधलाई नजर दीदार गया।।

था प्यार तेरा रग रग में मेरीतू तोड़ के दिल को मार गया।।

दावे थे जिसके खुद से बड़ेवो इश्क की बाजी हार गया।।

इतना न चाहो मुझे बहुत दूर हूँ मैं जमाने के असूलों से मजबूर हूँ मैं



इतना न चाहो मुझे बहुत दूर हूँ मैं
जमाने के असूलों से मजबूर हूँ मैं


दिखा नहीं सकती हाले दिल तुम्हें माना कि चाहतों से भरपूर हूँ मैं पहने रहती हूँ इकक मुखौटा सदा समझते है सब कि मगरूर हूँ मैं उम्मीदें है मुझसे सभी को बहुत मेरे अपनों का सदा गुरुर हूँ मैं शब्दों से खेल लेती हूँ जो थोडा सोचते है सभी बहुत मशहूर हूँ मैं चढ़ता है जो नशा पढ़ने से मुझे धीरे धीरे सर चढ़े वो सुरूर हूँ मैं बना न सकी पहचान कोई अभी जमाने के तकाजों का दस्तूर हूँ मैं